लगातार देश में कोविड-19 से हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं विगत 24 घंटों में अब तक के सभी रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए हैं, लोग स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से लगातार जूझ रहे हैं।

भारत पिछले 24 घंटे में 2,16,850 नये केस के साथ 1183 लोगों की मौत दर्ज की गई है यह महज सरकारी आंकड़े है।

असली आंकड़े जानकार लोगों के मुताबिक और भी खतरनाक हो सकते हैं बहरहाल आंकड़े जो भी सही हो, लेकिन इतने खतरनाक आंकड़ों के बावजूद देश कि शासन व्यवस्था यानी सत्ता के साथ जिनके जिम्मे लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है वह सभी राजनेता भारी भरकम भीड़ के साथ चुनाव प्रचार में जुटे हैं।

हमारे राजनेताओं को कोविड-19 के खतरनाक माहौल, लोगों की मौतों से कोई फर्क नहीं पड़ता हुआ नहीं दिख रहा है,  वह भारी-भरकम भीड़ के साथ रैलियों में जनता की वोट के खातिर तरह-तरह के बयान देते रहे हैं, वर्तमान में दे भी रहे हैं।


(ट्वीट क्रेडिट- पत्रकार दीपक चौरसिया)


लेकिन यह नेता अपने विचारों बयान पर कितना अमल करते हैं यह बखूबी बयान- देख सुनकर वर्तमान परिस्थिति में इनके दायित्व को भी समझ सकते हैं।


आज जमीनी हकीकत उन बयानों से बिल्कुल विपरीत नजर आ रही है।  गलत बात है। अब तो स्थिति यह है कि यह बयानवीर सत्य लिखने पर हर कलम को तोड़ने पर अमादा हैं। यहां मैं किसी एक पार्टी की बात नहीं कर रहा यहां एक सब का एक सा हाल है यू कहे कुएं में ही भांग पड़ी है एक कहावत हमारे यूपी में बहुत कही जाती है इस हमाम में सब (निर्वस्त्र) एक से हैं यानी इस स्थिति में हर पार्टी  एक सी नजर आ रही है।



मीठे समाज कल्याण स्थिति संभालने के लोकलुभावन वादों के बयानों से आज तक किसका कल्याण हुआ है ?

जमीनी स्तर पर जाइए इन सब की करनी और कथनी का फर्क बिल्कुल साफ दिखाता है।


उनकी रैलियों के बाद कोविड-19 के क्या, हालात होंगे?

लोगों में कितनी तेजी से कोविड-19 प्रसारित होगा ?

उन्हें इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता, इसके विपरीत मध्यप्रदेश के मंत्री कहते हैं जिसे जब मरना है वह मरेगा ही

आंकड़ों के मुताबिक- बता दे अधिकतर बंगाल से लौट रहे राजनेता से लेकर पत्रकार कोविड-19 संक्रमित पाए जा रहे हैं। हमारे विपक्षी राजनेता नकारा ही सही, लेकिन जिनकी जिम्मेदारी है वो लोकतंत्र के चारों खंभे लगभग इस चुनाव के दरमियान सरकार के आगे नतमस्तक या कमजोर नजर आ रहे हैं यानी भारी-भरकम भीड़ के साथ राजनेता भारी भरकम भीड़ के साथ चुनाव प्रचार कर कोविड-19 के संक्रमण को और अधिक तेजी से प्रसारित करने में सहयोग कर रहे हैं दूसरी तरफ हमारी संवैधानिक संस्थाएं मौन समर्थन देकर लगभग सरकार के आगे कमजोर नजर आ रही है।

बेशक राजनेताओं को अच्छे हॉस्पिटल मिल जाएंगे, लेकिन जनता का क्या हाल है इसे किसी को सुध लेने की जरूरत क्यों जरूरत नजर नहीं आ रही है ?


जनता को कोविड-19 प्रोटोकॉल पालन करने की नसीहत, खुद पर लागू क्यों नहीं करते ?

हमारे राजनेताओं की करनी और कथनी में क्यों फर्क है ?

मौत और संक्रमण के आंकड़े बड़ी तेजी से बढ़ रहे लेकिन चुनाव फिर भी क्यों जारी है ?

क्यों लोगों की जिंदगी से ज्यादा लोकतंत्र में राजनेताओं को राज्यों में सरकारें बनाना (ज्यादा) जरूरी है ?

क्यों पत्रकारों पर दबाव डाल या केस ठोकने की धमकी दे, मौत के सही आंकड़े को प्रकाशित करने से रोका जा रहा है ?

क्यों विशेष राजनीतिक दल आपदा को अवसर में बदलने में जुटे हैं ?

(क्रेडिट- निडर पत्रकारों के ट्वीट) के साथ विशाल गुप्ता की रिपोर्ट

(आंकड़े क्रेडिट- WORLD OMETERS)

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