“लोकतंत्र में जनता राजा होती है” वह सरकार बना भी सकती हैं और बिगाड़ भी सकती हैं यानी कि वह जब चाहे अपने किराएदार (प्रतिनिधि) को सत्ता सौंप सकती हैं और (सही वादों को पूरा न करने पर) जब चाहे किराएदार (प्रतिनिधि) बदल सकती हैं”

किसानों ने कहा जिसे बात करना हो, वो यहां पर (प्रदर्शनकारियों के बीच में) आकर बात करें, हम बातचीत के लिए तैयार हैं हमें खेद है कि हम सड़क पर बैठे हैं, लेकिन यह भी आम लोगों से जुड़ा मुद्दा है हमें उन सर्वोच्च राजनेताओं तक अपनी बात पहुंचा कर अपने अधिकारों की रक्षा करनी है इसलिए हम आंदोलन कर रहे हैं सरकार बातचीत कर हमारी मांग को मान ले हम तत्काल आंदोलन छोड़कर वापस लौट जाएंगे।

महीने से जारी किसानों का आंदोलन दिल्ली बॉर्डर पर आज चौथे दिन लगातार जारी है सरकार की ओर से वार्ता की पेशकश को किसानों ने सिरे से ठुकरा दिया है। दूसरी तरफ गृह मंत्री अमित शाह हैदराबाद के चुनाव प्रचार में लगे रोड शो कर रहे हैं। तो दूसरी तरफ देश की राजधानी कि सीमाओं पर नए कृषि कानून का विरोध करते हुए किसान दिन रात एक कर ठंड के बीच प्रदर्शन कर रहे हैं। दूसरी तरफ बड़ी खबर आ रही है कि किसानों ने नरेला के रास्ते दिल्ली की ओर कूच कर दिया है जहां पर पुलिस को दोनों तरफ से किसानों ने घेर लिया है कुछ ट्रैक्टर पैदल किसान खेतों के रास्ते दिल्ली में प्रवेश कर चुके हैं

वही किसान नेता बलदेव सिंह सिरसा ने कहा कि हम किसान किसी भी स्थिति में बुरडी नहीं जाएंगे यह निर्णय उनके तीस संगठनों ने मिलकर किया है।

किसानों को चौतरफा मिल रहे समर्थन के बाद किसान संगठन उत्साह में है दूसरी तरफ केंद्र सरकार बीच का रास्ता निकालने के लिए बैठक पर बैठक कर रही है, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने किसानों को धरना देने के लिए दिल्ली के बुराड़ी में स्थित संत निरंकारी मैदान पहुंचने के लिए कहा था उसके बाद उन्होंने अपने प्रतिनिधियों के द्वारा किसानों से बात करने की बात कही थी जिसे किसानों के संगठन ने मिलकर ठुकरा दिया है यानी कि ये बातचीत की संभावना भी खत्म हो गई है।

मौजूदा स्थिति की बात करें तो सिंधु बॉर्डर पर पुलिस बैरिकेडिंग के दोनों तरफ किसानों का बेड़ा पहुंच गया है। मौजूदा स्थिति में पुलिस बेबस दिख रही है अचानक से किसान लामपुर बॉर्डर से ट्रैक्टरों के साथ पहुंच गए। पानीपत व सोनीपत के बाद गांव के रास्ते दिल्ली में उनका एक ट्रैक्टर का बेड़ा धुस गया है फिर हाल दिल्ली में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच सभी बॉर्डर पूरी तरीके से बंद कर दिए गए हैं। जाम की स्थिति बरकरार है लगातार किसान संगठन अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं।

दूसरी तरफ जवान सुरक्षा व्यवस्था की खातिर डटे हुए हैं। किसानों ने सरकार से बिना शर्त बातचीत करने की मांग की है फिरहाल उत्तर प्रदेश के किसान यूपीगेट पर जमा है वहीं कई जगह पर दिल्ली पुलिस द्वारा लगाए गए बैरिकेडिंग को उत्तर प्रदेश किसान यूनियन के लोगों ने तोड़ दिया है। भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत के कहने पर किसान शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं जिसके बाद उत्तर प्रदेश के किसानों को रोकने के लिए 2 लेयर वेरीकैटिंग दिल्ली पुलिस द्वारा लगायी गई हैं। सुरक्षा के कड़े इंतजाम के बीच किसानों को दिल्ली में घुसने से रोकने के लिए सरकार हर प्रयास कर रही है।

किसानों द्वारा लगातार आशंका जताई जा रही है की राजनीति के चलते उनके आंदोलन को बदनाम करने के लिए बीच में कुछ शरारती तत्व घुसा कर आंदोलन में रणनीति के तहत उनकी आवाज दबाने के लिए कुछ राजनीतिक लोग खालिस्थान जैसे शब्दों का उपयोग कर इसे दबाने की कोशिश कर रहे हैं।

वही सत्ताधारी से लेकर मीडिया में भी खालिस्तान समर्थकों की चर्चा है वह उन्हें चरमपंथी समर्थक कहकर आंदोलन कार्यों को खालिस्तानी का तमगा लगा बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अधिकतर जमीनी हकीकत पर किसानों की आवाज है जमीनी हकीकत पर किसानों का लंबा- लंबा काफिला चल रहा है बैठे किसान लगातार मांग कर आगे बढ़ रहे हैं बदनाम करने के लिए राजनीति कियी जा सकती हैं नजारा बिल्कुल साफ है किसानों के पास हथियार नहीं हैं अराजक चीजें नहीं हैं लेकिन अधिकतर सोशल मीडिया पर वीडियो बीते समय के अलग-अलग देशों के हैं जिन्हें एक साजिश के तहत फैलाया जा रहा है अब खुद देख सकते हैं हाथों में डंडा झंडा बुजुर्ग व किसान राजधानी की सीमा पर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करते हुए राजधानी की सभी तरफ की राज्य की सीमाओं पर डटे हुए हैं।

यहां किसान संगठन दृढ़ निश्चय के साथ सरकार द्वारा लाए गए नए कृषि संशोधन बिल एमएसपी की गारंटी को जुड़वाने व अपने लिए उत्पन्न हो रहे खतरों से सुरक्षा चाहने के लिए लगातार विरोध प्रदर्शन कर सरकार से सख्त आश्वासन चाहते हैं। अधिकतर किसान सभी तीनों नई कृषि कानूनों को सरकार से तत्काल वापस करने की मांग कर रहे हैं।

इनमें (किसानों में) सरकार की मौखिक बातों का विश्वास तक नहीं है इसलिए कई बार वार्तायें आश्वासन के बाद स्वता ही टूट जा रही हैं किसान कहते हैं वह अपना राशन लेकर आए हैं सोने के लिए गद्दे हैं वो कहते है हम सर्दी में गेहूं सीच सकते हैं तो छोटी- मोटी ठंडी यू गुजर जाएगी। हमने रास्ता इसलिए रोक रखा है कि हमारी आवाज सिर्फ सत्ताधारियों तक पहुंच सके।

“किसानों से जब पूछा कि दिल्ली व देश में बड़ी तेजी से कोविड-19 का कहर बाढ़ रहा है फिर भी आप लोग आंदोलन कर रहे हैं, क्या कोविड-19 का आपको खतरा नजर नहीं आता ?

इसके जवाब में किसानों ने उत्तर दिया, “हमें ना चाहते हुए मजबूरी में आंदोलन के लिए दिल्ली आना पड़ा यह हमारे वर्तमान और बच्चों के भविष्य का सवाल है हम उनके भविष्य से खिलवाड़ होता नहीं देख सकते आंदोलन करना हमारा शौक, नहीं मजबूरी है हम पहले दिन से सरकार के इस काले कानून का विरोध कर रहे थे, 2 माह बीत गए आंदोलन करते हुए अभी 4 दिन ही बीते हैं दिल्ली आए कानून वापस करा कर हम लोग वापस जाएंगे, कोविड-19 का खातरा पेट के खतरे से बढ़कर नही हैं”

किसान लगातार बता रहे क्यों नए कानून से खतरा है सरकार सख्त लिखित आश्वासन देते हुए एमएसपी को कानून में जोड़ दें ताकि कोई भी फसल मार्केट में एमएसपी से नीचे किसी कीमत पर नही बिके, अन्यथा उद्योगपतियों के हाथों की कट पुतली बना दिया जाएगा। वह जब चाहे किसानों की फसल मनमानी कीमत पर खरीद कर उनकी मेहनत को मिट्टी में मिला सकते है मंडियों के खत्म होने से एकमात्र उद्योगपतियों के हाथ में फसल बेचने का रास्ता रह जायेगा, सरकार कब एमएसपी की व्यवस्था खत्म कर दे यह भी निश्चित नहीं है। किसान लगातार बढ़ते हुए निजी करण को लेकर भी चिंता ग्रस्त है।

अब उन्हें उस तरीके से मीडिया पर भी भरोसा नहीं रह गया है वह खुद सरकार से सख्त लहजे में नया कानून वापस लेकर एमएसपी को जोड़ने की बात करना चाहते हैं कि कानून में इसे स्पष्ट शब्दों में उल्लेख किया जाए कि एमएसपी से नीचे कोई भी फसल नहीं बिकेगी। ताकि मंडी की चिंताओं से निजात मिल कर चीजें साफ हो सकें, उन्हें लगातार नए कानून से खतरा महसूस हो रहा है कि मंडी व्यवस्था ध्वस्त कर उन्हें उद्योगपतियों के हाथ का कठपुतली बनाया जा सकता है,हो सकता है सरकार जो कह रही है वह सही हो लेकिन किसानों को अगर भ्रम है तो सरकार को एमएसपी को कानून में शामिल कर उस भ्रम को दूर करने की तत्काल जरूरत है एक तरफ कोविड-19 का कहर जारी है तो दूसरी तरफ सड़कों पर किसान के आने से कृषि व्यवस्था भी चौपट हो गई है। इकोनामी तबाह हो ही रही है, ये किसान है चरमपंथी तो कतई नहीं हो सकते रास्ते पर अपने अधिकार के लिए बैठे हैं ताकि जल्द से जल्द सुना जा सके, इनके हाथ में हथियार नहीं है उनके हाथों में बर्तन हैं ये हाथों से आटा गूंथ रहे हैं सड़क पर बैठकर रोटी खा रहे हैं प्याज काट रहे हैं चरमपंथियों के हाथों में हथियार होते हैं इनके हाथ में बर्तन हैं। बड़े प्यार से नारे लगाते हुए खुद लाठी खाने का जिगरा दिखा रहे हैं। कुछ लोग व संगठन इन्हें स्वार्थ के चलते बदनाम करने की कोशिश में लगे हुए हैं हो सकता है कई राजनीतिक संगठन किसान का राजनीतिक प्रयोग कर अपनी राजनीति कर रहे हो। लेकिन अधिकतर किसान निष्पक्ष है उन्हें राजनीति से कोई लेना-देना नहीं, वो अपने हित सुनिश्चित करना चाहते है।

राजनेता हो या नौकरशाह देश के मालिक नहीं बस जनता के अधिकारों की रक्षा कर उनकी सेवा करने के लिए नौकर है वह अपने पद पर एक निश्चित समय के लिए किराएदार है, देश की असली मालिक जनता हैं, बाकी शेष निश्चित समय के लिए किराएदार…. जनहित की अनदेखी करने पर जनता को उन्हें हटाने व उचित कार्यवाही करवने का अधिकार है

किसानों की जायज मांगों को मानकर सरकार को तत्काल उन्हें संतोषजनक हल उत्पन्न कर वार्ता कर उन्हें संतुष्ट करना चाहिए ताकि उनका भ्रम दूर हो। वहा चाहे जितना सहज महसूस करें जो सत्ता का काम होता है उसे सत्ता को ईमानदारी से करना चाहिए। क्योंकि जन से ही जनतंत्र होता है देश का मालिक यही आम आदमी (किसान) है राजनीतिक पार्टी हो या नौकरशाह, मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री सभी जनता के प्रतिनिधि यानी कि जनता द्वारा चुनकर 5 साल के लिए भेजे गए किराएदार हैं अगर यह सही से अपना फर्ज अदा कर पाने में असमर्थ रहते हैं तो जनता को इन्हें हटा कर किराएदार का पद दूसरे को देने का अधिकार रहता है यही लोकतंत्र है। अगर कोई भी नौकरशाह आईएसपीसीएस से लेकर शासन एक अधिकारी को किसी भी डिपार्टमेंट का हो (जनतंत्र) जनता के अधिकारों का हनन व अनदेखी कर कुछ भी संविधान के विरुद्ध करता है तो उसे तत्काल हटा कर उसके विरूद्ध कार्रवाई करने का सबूत देने के साथ जनता को पूर्ण अधिकार है कि वह उसे आगे बढ़ये ताकि उसे साबित कर उन्हें उनके गुनाहों सजा दी जा सके….

“नए कानून को लेकर बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा गृह मंत्री अमित शाह के साथ बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने बैठक की उन्होंने किसानों को समझाने बुझाने के लिए आपस में चर्चा कर रणनीति बनाई। फिर हाल किसान नेताओं ने पहले ही गृह मंत्री अमित शाह की प्रस्ताव को ठुकरा दिया है उन्होंने कहा है कि हम बिना शर्त सरकार द्वारा नए लाए गए कानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैं बिना मांग वापस लिए हम सबको से नहीं हटेंगे”

“वहीं कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि नए कानून का एमएसपी से कोई लेना देना नहीं है एमएसपी पर पहले भी खरीद होती थी और आगे भी जारी रहेगी”

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