loading...

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार को लिखे गए पत्र का हिंदी रूपांतरणविषय: यूपी के राज्य में प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों के अधिकारों का संरक्षण, हम आपको संबोधित करने के लिए आग्रह कर रहे हैं। प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा और कार्यशील पत्रकारों के अधिकारों और सुरक्षा के संबंध में महत्वपूर्ण मुद्दे, उत्तर प्रदेश राज्य में। हाल के दिनों में, कई घटनाएं सामने आई हैं, जो उत्तर प्रदेश में स्वतंत्र, निर्भीक और स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए अंतरिक्ष पर गहरी चिंता जताती हैं। जब आप मुंबई में एक टीवी चैनल के संपादक को गिरफ्तार करने के लिए प्रेस की स्वतंत्रता को तुरंत बनाए रखने के लिए सही थे, तो यूपी में कामकाजी पत्रकारों के अधिकारियों द्वारा उन्हें डराने-धमकाने, परेशान करने के और भी कई मामले सामने आए, जिन्हें उनकी नौकरी से रोका गया। उनमें से कई को अनुचित आरोपों में गिरफ्तार किया गया है। हम कुछ ऐसे मामलों की सूची नीचे दे रहे हैं: 1. सिद्दीक कप्पन: दिल्ली के एक पत्रकार, जो मलयालम समाचार पोर्टल अज़ीमुखम के लिए काम करते हैं, तीन अन्य लोगों के साथ, हाथरस के रास्ते में, एक दलित लड़की के सामूहिक बलात्कार की रिपोर्ट करने के लिए, जब वह था 5 अक्टूबर, 2020 को मथुरा में उठाया गया और बाद में गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा 17 के तहत मामला दर्ज किया गया। कथित रूप से कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया के साथ जुड़े दो अन्य, केरल स्थित पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया के छात्रों की शाखा ने यूपी पुलिस पर एक पर्चे के रूप में सबूत लगाने का आरोप लगाया था। कप्पन, अन्य के साथ मथुरा जेल में बंद हैं। पुलिस के अनुसार वे हाथरस सामूहिक बलात्कार के मद्देनजर यूपी में जातिगत दंगे भड़काने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्त पोषित “साजिश” का हिस्सा थे। 4 नवंबर को, मथुरा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने यूपी स्पेशल टास्क फोर्स को पूछताछ के लिए 48 घंटे की पुलिस रिमांड दी। वह अभी भी जेल में है और उसके परिवार को उससे बात करने की अनुमति नहीं है। 2. सुप्रिया शर्मा: 18 जून, 2020 को SC / ST एक्ट और IPC 501 (मानहानि के रूप में ज्ञात मामले को छापना या उकेरना), और 269 (लापरवाही से काम करने की संभावना) के तहत सुप्रिया शर्मा, स्क्रॉल की कार्यकारी संपादक के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में मामलों की खराब स्थिति पर कहानियों की एक श्रृंखला की रिपोर्ट करने के लिए बीमारी का जीवन के लिए संक्रमण फैल गया)। वाराणसी में पीएम मोदी द्वारा गोद लिए गए गांव डोमरी की निवासी माला देवी की शिकायत पर यह आरोप लगाया गया था कि सुप्रिया शर्मा ने गलत सूचना दी थी कि भोजन की कमी के कारण कोरोना वायरस प्रेरित लॉकडाउन के दौरान उनकी हालत खराब हो गई थी।पता: 4/7-ए आईएनएस निर्माण, रफी मार्ग। नई दिल्ली -110001ईजी एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया3. बिजनौर के पांच पत्रकारों- आशीष तोमर, शकील अहमद, लखन सिंह, आमिर खान और मोइन अहमद के खिलाफ 7 सितंबर, 2020 को आईपीसी 153 ए (धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच एकता को बढ़ावा देना) के तहत मामले दर्ज किए गए। दौड़, जन्म स्थान, निवास, भाषा, आदि, और सद्भाव के रखरखाव के लिए पूर्वाग्रहपूर्ण कार्य करता है), 268 (पबली उपद्रवी) और 503 (आपराधिक धमकी) और आईटी अधिनियम की धारा 66 ए। एफआईआर में तोमर और अहमद पर आरोप लगाया गया था कि वे मांडवार थाने के अंतर्गत तितरवाला बस्सी गाँव के एक वाल्मीकि परिवार के बारे में फर्जी खबरें प्रसारित करके, अपने घर को पानी के हैंडपंप से पानी इकट्ठा नहीं होने देने के बाद बिक्री पर रख रहे थे। स्थानीय मांसपेशियों का उत्पीड़न। पत्रकार अपनी कहानी के साथ खड़े थे और जिला प्रशासन को एक एक्शन कमेटी के सदस्यों द्वारा विरोध दर्ज कराने के बाद मामला वापस लेना पड़ा। 4. रवींद्र सक्सेना: सीतापुर की महोली तहसील के एक संगरोध केंद्र के कुप्रबंधन के बारे में रिपोर्ट करने के लिए, टुडे -24 के एक समाचार पोर्टल के रिपोर्टर को SC / ST एक्ट और आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत बुक किया गया था। पत्रकारों के विरोध के बाद, सक्सेना की गिरफ्तारी रोक दी गई थी लेकिन एफआईआर वापस नहीं ली गई। 5. विजय विनीत और मनीष मिश्रा: 26 मार्च, 2020 को वाराणसी जिले के कोइरीपुर गाँव के मुसहर निवासियों की दुर्दशा के बारे में अपनी रिपोर्ट दिखाने के लिए एक स्थानीय दैनिक जनादेश टाइम्स के इन पत्रकारों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए थे, जिसमें एक बच्चे को घास खाते हुए दिखाया गया था। । 6. लखनऊ के एक स्वतंत्र पत्रकार असद रिज़वी पर 2 अक्टूबर को पुलिस ने हमला किया था। जब वह कुछ हफ़्ते पहले हाथरस में एक दलित लड़की के बलात्कार के बाद शहर में विरोध प्रदर्शन की सूचना दे रहे थे। रिजवी द्वारा पुलिस और राज्य अधिकारियों को लिखे गए एक शिकायती पत्र में, उन्होंने उल्लेख किया कि उन्हें 7-8 पुलिसकर्मियों ने पीटा था, भले ही उन्होंने उन्हें बताया था कि वह एक पत्रकार हैं और बस विरोध स्थल को कवर कर रहे हैं। उसके बाद, पुलिस ने उसका मोबाइल फोन तोड़ने की कोशिश की और उसका मेमोरी कार्ड जब्त कर लिया। भारत के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में, आप इस महत्वपूर्ण मिसाल से अच्छी तरह से वाकिफ हैं कि राज्य सभी संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के संबंध में निर्धारित करता है। यह विशेष रूप से मुक्त मीडिया के लिए जगह को संरक्षित करने के संबंध में महत्वपूर्ण है, एक ऐसे समय में जब दुनिया एक महामारी के गले में रही है। मीडिया ने महामारी के बारे में जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हम आपसे जेल के पत्रकारों को मुक्त करने, उन मामलों को वापस लेने का अनुरोध करते हैं, जिनकी समीक्षा चल रही है, साथ ही साथ राज्य के सभी कामकाजी पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है। संपादकों गिल्ड, लखनऊ में राष्ट्रीय संपादकों के एक प्रतिनिधिमंडल को भेजने के लिए, आपसे मिलने और अपने प्रशासन के साथ काम करने के लिए उन तरीकों का पता लगाने के लिए उत्सुक हैं, जो बिना किसी डर या पक्ष के काम करने के लिए मीडिया के लिए एक सुरक्षात्मक वातावरण बना सकते हैं। हम सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए तत्पर हैं।साभार, सीना मुनियालो संजय कोपर अनंत नाथ कोषाध्यक्ष सीमा मुस्तफा संजय कपूर महासचिव अध्यक्ष पता: ४ / IN- ए आईएनएस बिल्डिंग, रफी मार्ग, नई दिल्ली -११०००१

रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्णव गोस्वामी के मामले में रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क द्वारा जारी किया प्रेस रिलीज

बता दें कि महाराष्ट्र में लगातार सत्ता से टकराते हुए खोजी पत्रकारिता के साथ लगातार प्रशासन से सवाल पूछने से नाराज पत्रकार गोस्वामी पर 2018 के बंद पड़े केस में बिना लीगल नोटिस दिए प्रशासन द्वारा गिरफ्तार कर भारतीय लोकतंत्र पर हमला करते हुए लोकतंत्र के चौथे खंबे पर सीधा प्रहार कर पत्रकारों की आवाज दबाने की कोशिश के चलते बदले की भावना के तहत गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है|उत्तर प्रदेश के बलरामपुर केस में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को दी गई नोटिस|“सूरज चांद और सच ज्यादा समय तक छुप नहीं सकते”पत्रकार का काम निष्पक्ष तरीके से सत्ता से प्रश्न करते हुए देश की आम जनता यानी कि देश की वास्तविक मालिक के अधिकारों की सुरक्षा करते हुए उनके द्वारा उनके कल्याण के लिए नियम कायदे कानून बनाकर शासन करने के लिए 5 साल के लिए किरायेदार के रूप में बैठाए गए सत्ताधारी नेताओं को गलत करने से रोक कर लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को बराबर रखने का कार्य है लेकिन जनता द्वारा चुने गए राजनेता अपने आपको सर्वे सर्वा मानकर तानाशाही करते हुए अपने विरोध में उठने वाली हर आवाज को शम दाम दंड भेद से दबाकर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर लगातार प्रहार करते रहे हैं|

पत्रकारिता के जन्म से ही भारतीय इतिहास में मीडिया के दमन की शुरुआत हुई थी अंग्रेजी शासन द्वारा अंकुरित होती पत्रकारिता के कुचलने की कहानी…..

loading...

यह कोई भारतीय इतिहास में पहली बार नहीं हुआ है| पत्रकारिता के साथ ही भारतीय इतिहास में अंग्रेजों के समय से यह दमन चलता रहा है इतिहास में झांक कर देखने पर पता चलता है अंग्रेजों की गलत नीतियों का भंडाफोड़ करने के लिए मानववादी विलियम वोल्ट्स अंग्रेज अधिकारियों के क्रियाकलापों का विरोधी हो (ईस्ट इंडिया के व्यापारी) से पत्रकार बने विलियम वोल्ट्स में कलम उठाई अंग्रेजों ने साम दाम दंड भेद से विलियम वोल्टास की आवाज को दबाते हुए उसके द्वारा जुटाई गई जानकारी को आम जनता तक पहुंचाने की कोशिश को असफल करते हुए उसे बलपूर्वक भारत से बाहर निकाल दिया इंग्लैंड जाकर विलियम बोल्टर शांत नहीं हुआ, उसने इंग्लैंड में जाकर अंग्रेजों के काले कारनामे एकत्रित कर एक पुस्तक “कंसीडरेशन ऑन इंडियन अफेयर्स” लिखकर अंग्रेज अधिकारियों समेत ईस्ट इंडिया कंपनी के काले कारनामे उजागर कर अंग्रेजों की पोल पट्टी खोल कर सच को सामने लाया यही पत्रकारिता धर्म है| अंग्रेजों द्वारा भारत के इतिहास में अंकुरित होती हुई पत्रकारिता को दबाकर कुचल दिया गया|

जेम्स अॉगस्टस हिक्की ने पत्रकारिता के उच्च आदर्श स्थापित किये, शुरू हुई भारतीय पत्रकारिता

लेकिन अंग्रेजों की चालें ज्यादा दिन नहीं चली फिर एक अंग्रेज अधिकारी जेम्स अॉगस्टस हिक्की अंग्रेजों की दमन चक्र को देखते हुए उठ खड़ा हुआ और उसने जनजागृति फैलाकर अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी भारत का पहला अखबार 29 जनवरी 1780 को कोलकाता से कोलकाता जनरल एडवाइजर जिसे बंगाल गजट के नाम से जाना जाता है को अंग्रेजी में सप्ताह में दो बार प्रकाशित करते हुए भारतीय पत्रकारिता की नीवं डाली अंग्रेजों द्वारा लगातार पत्रकारिता वसूल व पत्रकारिता का दमन जारी रहा 2 साल बाद अंग्रेजों की कुटिल नीति के चलते प्रेस को जप्त कर फिर एक बार भारत की अंकुरित होती होती पत्रकारिता को आजादी के दुश्मन अंग्रेज अधिकारियों ने कुचलकर जेम्स अॉगस्टस हिक्की को जेल में डाल कर 1782 में ₹5000 का जुर्माना लगाया जेम्स अॉगस्टस हिक्की डरा नहीं उसकी पिटाई की गई बहादुर हिक्की ने अंग्रेजो के अत्याचारों से लड़ते हुए बहादुरी के साथ जेल से ही बंगाल गजट का संपादन करता रहा अंग्रेजों की कुटिल नीतियों के चलते उसे अंत में बंगाल छोड़कर जाना पड़ा| हिक्की ने भारतीय भूमि पर जो पत्रकारिता की छाप छोड़ी वह स्वतंत्र निर्भीक ओजस्वी पत्रकारिता थी यह हमेशा पत्रकारों को प्रेरणा देती रहेगी| जेम्स अॉगस्टस हिक्की एक अंग्रेज अधिकारी था वह भ्रष्टाचार अपने अधिकारियों के कारनामों से लड़ते हुए उस समय पत्रकारिता के लिए कोई भी कानून नहीं था ना बोलने की आजादी यानी कि अभिव्यक्ति की आजादी थी ही नहीं, उस समय एक शब्द भी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बोलना बहुत बड़ी बात थी अदम्य साहस दिखाने वाली पत्रकारिता के आदर्शों को संजोए रखा है आज उन्हीं मूल्य को उसी अंग्रेजी गवर्नमेंट की तरह चाले चलकर अंग्रेजों के बनाए कानूनों के जरिए आजाद भारत में पत्रकारिता के मापदंडों के साथ व्यक्ति की आजादी का गला घोट कर साम दाम दंड भेद गुंडे मवाली से लेकर हर हथकंडे द्वारा प्रताड़ित कर सच की आवाज को दबाने का काम समय-समय पर किया जाता हुआ दिखता रहा है देश बेशक आजाद हो गया हो| लेकिन आज भी मीडिया को आजादी नहीं मिल पाई है जो दुनिया के शीर्ष देशों में प्राप्त है आज हमें खबर लिखते वक्त यह डर हमेशा बना रहता है कि कहीं प्रशासन शासन द्वारा नियम कायदे कानूनों के गलत उपयोग के द्वारा बदले की भावना से या फिर गुंडे मवाली के द्वारा बदले की कार्रवाई की जाए| बात आजाद भारत की हो या गुलाम भारत की अंग्रेजों ने पत्रकारिता को कुचलने के लिए हर हथकंडे अपनाए इसी कड़ी में अंग्रेजों द्वारा 13 मई 1799 को विधिवत प्रेस एक्ट लागू कर के संपादक संचालक के नाम सरकार को लिखित रूप से देने के नियम बनाए गए| जिसके बाद शुरू हुआ खेल धीरे-धीरे जिस प्रकार अंग्रेजी जनरल बदलते नियम कडे और हल्के किए जाते रहे अट्ठारह सौ 57 के विद्रोह के वक्त भारत में पूरी तरीके से प्रेस का गला घोट कल लॉर्ड कैनिंग ने अखबारों को जनता में विरोध फैलाने वाला बताकर गला घोटू कानून बनाया जिसके कारण बड़ी संख्या में अखबारों का अंत हो गया जो बचे उन पर ब्रिटिश सरकार ने अधिकार स्थापित कर अनुमति पत्र छीन लिए|

आजाद भारत में पत्रकारिता की दुर्दशा रही खराब, इंदिरा गांधी से लेकर घोषित अघोषित इमरजेंसी लगा समय-समय पर घोटा जाता रह पत्रकारिता का गला

भारत देश बड़े प्रयत्नों के बाद अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हो गया बोलने की आजादी मिली कानून मिले लेकिन धरातल पर जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात हो गयी| कानून चाहे जो बन जाए भारत देश में नेता से लेकर अभिनेता तक, गांव के लठेत से लेकर प्रधान तक, पुलिस से लेकर दलाल तक, कोई ना कोई काट निकाल कर घोषित अघोषित तरीके से अभिव्यक्ति की आजादी का समय-समय पर गला घोटते रहे हैं शासन जिसके हाथ में खैर उसका कौन क्या कर पाएगा समय बलवान है 1 दिन सच भी सामने आएगा, गुंडे भ्रष्टाचारी मवाली अपराधी की मां आखिर कब तक खैर मनाएगी?बात करें पत्रकारिता का गला घोटने का तो भारत की भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी जी ने 25 जून 1975 को इमरजेंसी लगाकर पत्रकारिता का दिल खोल के चिर हरण करते हुए गला घोट दिया| एंकर से लेकर डर दबाव पैसा देकर पत्रकारों को दूरदर्शन पर बैठा कर सरकार की गलत नीतियों को सही ठहरा कर लगातार पत्रकारिता पर कुठाराघात किया जाता रहा है| आज भी कबाड़ी वाले से लेकर ठेले वाले तक को जिन्हें पत्रकारिता के मूल्यों की रत्ती भर भी जानकारी नहीं उन्हें इस पवित्र पेशे को बदनाम करने के लिए आदर्श सिद्धांतों को बेचकर कुछ पैसे के भूखे भेड़िया इस पैसे की साख गिराने में लगे हुए हैं इनके लिए कड़े प्रावधान के साथ पत्रकारिता के सिद्धांत व डिग्री जैसी व्यवस्था को अनिवार्य किए जाने की जरूरत है ताकि पेशेवर पत्रकारिता से अलग अपराधिक प्रवृति वाले दूर रहे…….प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का घोषित तरीके पर इमरजेंसी लगाकर गला घोटना बच्चे बच्चे की जुबान पर है लेकिन देश के अलग-अलग प्रांतों से लेकर हिस्सों तक में भूत से लेकर वर्तमान तक में गला घोट आ जाता रहा है और घोटा जा भी रहा है शायद कोई ऐसा प्रांत होगा जहां खबर लिखने से गुस्साए गुंडों या प्रशासन ने पत्रकारों पर हमला कर लोकतंत्र की आवाज को ना दबाया गया हो, अधिकतर जगह पर इन्हें सत्ता का समर्थन हासिल रहा है देश का असली मालिक आम आदमी है यह 5 साल के किराएदार नेता सही काम कर जनता को चुनाव में हिसाब दे अगले 5 साल के लिए फिर किराए पर लेने के लिए बैठते हैं यह परमानेंट मालिक नहीं है लेकिन यह तानाशाही कर अपनी लूट का खसोट कमीशन खोरी रिश्वतखोरी गुंडागर्दी तमाम काले कारनामे जब मीडिया द्वारा इन पर खबर चलाई जाती है तो कुठाराघात कर अपने आप को बचाने के लिए या तो फिर पत्रकार को खरीदने की कोशिश की जाती हैं| जो नहीं बिका उस पर सीधे हमला आप अच्छी तरीके से वाकिफ होंगे, कितने पत्रकारों को इमानदारी के चलते तमाम अलग-अलग केसों में फंसा कर जेल में ठूंस दिया गया जो कल भी हो रहा था कल भी होता रहेगा, मेरे कहने का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि हर पत्रकार या हर राजनेता गलत होता है यहां पर अधिकतर तानाशाही रवैया अपनाते हैं जो पत्रकार सत्ता व अपराधियों से मिल जाता है वह सत्ता की चासनी में डूब कर मजे से रहता है और जो सच्चाई ईमानदारी के साथ झुकता नहीं उसका हश्र आप बखूबी जानते हैं…………

1 दिन सच झूठ सब सामने आ जाता है झूठे बदनाम तो हीरे की तरह चमकते हैं सच्चे

सुख के बाद दुख, दुख के बाद सुख आता रहता है सच का धर्म सदैव रहा है इतिहास गवाह है और भविष्य भी गवाह रहेगा,

अन्याय गुंडागर्दी अत्याचार झूठ के अंधेरे सच के उजाले को कभी हरा नहीं सकते| वो गुंडागर्दी तो कर सकते हैं लेकिन सामने इमानदारी से सर उठा नहीं सकते|…….

loading...

लोंकतन्त्र की हत्या (इमरजेन्सी) आपातकाल, प्रधानमंत्री की तानाशाही
/जय हिंद ——+++——जय भारत माता कीVK GUPTA VISHAL

loading...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here